सागर - डॉक्टर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय में भारतवर्ष का राष्ट्रीय पावन पर्व स्वतंत्रता दिवस धूमधाम से मनाया गया. इस अवसर पर विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. नीलिमा गुप्ता ने ध्वजारोहण किया तथा राष्ट्रगान के बाद सभा को संबोधित किया। उन्होंने भारतवर्ष के राष्ट्रीय पावन पर्व स्वतंत्रता दिवस की बधाइयाँ एवं शुभकामनायें देते हुए कहा कि आज हम सभी भारत की स्वतंत्रता के 79वें वर्ष में प्रवेश कर गर्व और गौरव से परिपूर्ण हैं। यह दिन केवल एक ऐतिहासिक स्मृति नहीं है, यह हमारे राष्ट्रीय चरित्र, संस्कृति, और सभ्यतागत मूल्यों की पुनः पुष्टि का दिन है। भारत की स्वतंत्रता किसी उपहार में नहीं मिली थी, यह लाखों जाने-अनजाने शहीदों के त्याग, तपस्या और बलिदान का परिणाम थी। हमारे राष्ट्र पिता महात्मा गांधी ने सत्य और अहिंसा की मशाल जलाई, तो नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा" कहकर क्रांति की चिंगारी दी. डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान के माध्यम से स्वतंत्र भारत को न्याय, समानता और बंधुत्व की नींव दी, तो भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, अशफाक उल्ला खान जैसे क्रांतिकारियों ने अपने प्राणों की आहुति देकर आने वाली पीढ़ियों को जीने का अधिकार दिलाया। आज हमें यह आत्ममंथन करना होगा कि क्या हम उस बलिदान के योग्य भारत का निर्माण कर रहे हैं?
उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता दिवस केवल ध्वजारोहण, परेड और उत्सव का अवसर नहीं है। यह वह दिन है जब हम स्वयं से, अपने राष्ट्र से, और अपने भारतीय अस्तित्व से संवाद करते हैं। आज का यह अवसर हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि भारतीयता क्या है, और हम उसे कैसे जीवंत बनाए रखें। स्वतंत्रता का अर्थ केवल राजनीतिक आज़ादी नहीं है, यह हमारी भारतीयता को अपनाने, संजोने और उसका गर्व से संवहन करने का अवसर है। भारतीयता का तात्पर्य किसी एक धर्म, भाषा या क्षेत्र से नहीं, बल्कि विविधता में एकता, सहिष्णुता, और समरसता की उस चेतना से है, जिसने हमें युगों-युगों से एक सूत्र में बाँधे रखा है। भारतीयता वह भाव है जिसमें राम और रहमान एक साथ निवास करते हैं; जिसमें बुद्ध की करुणा, गांधी की अहिंसा, अंबेडकर का न्याय और विवेकानंद की आत्मा एकसाथ गूंजती है।
उन्होंने कहा कि भारतीयता का अर्थ है- विविधताओं में एकता को स्वीकार करना, हर मत, पंथ, संस्कृति और भाषा को सम्मान देना, वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना को व्यवहार में जीना। भारतीयता उस सांस्कृतिक चेतना का नाम है जो ऋषियों की तपस्या, गुरुओं की शिक्षा, शहीदों के बलिदान, और जन-जन की आस्था से जन्मी है। आज जब हम एक आधुनिक, डिजिटल और वैश्विक भारत की ओर बढ़ रहे हैं, तब यह और भी ज़रूरी हो गया है कि हम भारतीय मूल्यबोध को अपने आचरण और व्यवहार में आत्मसात करें।
वर्तमान में हम जिस तकनीकी और उपभोक्तावादी युग में हैं, वहाँ भारतीयता की आवश्यकता और भी अधिक हो गई है। क्योंकि जब बाह्य प्रलोभन हमें हमारी जड़ों से काटने का प्रयास करें, तब भारतीयता ही हमारी आत्मा की पुकार बनकर हमें स्थिरता प्रदान करती है। आज हम डिजिटल इंडिया की बात करते हैं, आत्मनिर्भर भारत की बात करते हैं-परंतु इन सबकी आत्मा तभी सार्थक होगी, जब हम संवेदनशील, नैतिक और संस्कृति-संपन्न नागरिक बनें।