सागर - मध्यप्रदेश के सागर जिले में शिक्षा के नाम पर ठगी का एक गंभीर मामला सामने आया है, जहां एक एनजीओ और निजी संस्थानों के माध्यम से छात्रों को डॉक्टर बनाने का झांसा देकर लाखों रुपये ऐंठे जाने के आरोप लगे हैं। पीड़ित छात्राओं ने मंगलवार को जनसुनवाई में सागर कलेक्टर के समक्ष आवेदन देकर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और कार्रवाई की मांग की है।
शिकायत में छात्राओं ने बताया कि उन्हें फोन के माध्यम से यह कहकर भ्रमित किया गया कि उनका एडमिशन सागर मेडिकल कॉलेज में हो गया है। कॉल करने वालों ने दबाव बनाते हुए कहा कि यदि दो दिन के भीतर प्रवेश नहीं लिया गया तो एडमिशन रद्द हो जाएगा और भविष्य में किसी भी मेडिकल कॉलेज में प्रवेश नहीं मिल पाएगा। इस झांसे में आकर छात्राओं ने तत्काल एडमिशन ले लिया।
पीड़ितों के अनुसार, उन्हें सागर के तिलकगंज स्थित गीतांजलि इंस्टीट्यूट, तिली क्षेत्र के बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज, तिली हॉस्पिटल और पंतनगर स्थित रावतपुरा नर्सिंग कॉलेज में प्रवेश दिलाने का लालच दिया गया। लेकिन प्रवेश के बाद न तो उन्हें किसी प्रकार की नियमित पढ़ाई कराई गई और न ही कोई प्रशिक्षण दिया गया। इसके उलट हर महीने केवल फीस की मांग की जाती रही।
छात्राओं ने आरोप लगाया कि उन्होंने अब तक आधे से अधिक फीस जमा कर दी है, लेकिन उन्हें किसी प्रकार की रसीद तक नहीं दी गई। जब उन्होंने संस्थान की मान्यता और पढ़ाई के बारे में जानकारी जुटाई, तो पता चला कि संबंधित कॉलेज फर्जी तरीके से संचालित हो रहा है। यह भी जानकारी सामने आई कि पूर्व में भी इस कॉलेज के खिलाफ कार्रवाई हो चुकी है।
जब छात्राओं ने अपनी जमा फीस और मूल दस्तावेज वापस मांगने का प्रयास किया, तो कॉलेज संचालकों द्वारा अभद्र व्यवहार किया गया। शिकायत में उल्लेख है कि संचालक सरिता त्रिवेदी ने न केवल गाली-गलौज की, बल्कि धमकी दी कि यदि कहीं शिकायत की गई तो उनके खिलाफ झूठे केस दर्ज कर जेल भेज दिया जाएगा। इतना ही नहीं, उन्होंने यह तक कहा कि “हमारा कोई कुछ नहीं कर सकता, हमारा भाई कलेक्टर है।”
इस पूरे मामले में अधिकतर पीड़ित छात्राएं ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों से हैं, जो बेहतर भविष्य की उम्मीद में इस जाल में फंस गईं। अब वे न केवल आर्थिक नुकसान झेल रही हैं, बल्कि उनका शैक्षणिक भविष्य भी अधर में लटक गया है।
पीड़ितों ने कलेक्टर से मांग की है कि मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए, साथ ही उनकी जमा की गई फीस और मूल दस्तावेज सुरक्षित वापस दिलाए जाएं। यह मामला जिले में शिक्षा व्यवस्था की निगरानी और फर्जी संस्थानों पर नियंत्रण को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है।